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दीपावली

 घर लौटने की दिवाली तो केवल श्री राम की थी  सीता का तो अयोध्या केवल कुछ वक़्त का ठिकाना था  मिथिला से निकलीं वो विवाह कर के  उन्हे अयोध्या से भी जाना था  पत्नी धर्म निभाया और वन में कुछ वर्ष बिताए  बड़ी प्रतीक्षा के बाद लंका से निकलने का समय आया  जो साक्षात सत्य हैं और प्रेम की प्रतिमा  उन्हे न मिथिला ने बुलाया न अयोध्या ने अपनाया  स्त्री राह के इस मोड़ पर स्वयं भूमिपुत्री को भी आना था  धरती से प्रकट हो कर फिर धरती में ही समाना था  जब न पिता सुरक्षा कर पाए, न पति ने सम्मान दिया  तो फिर ऐसी दिवाली का क्या अर्थ है जब सीता स्वयं बंजारी बनीं  तो सियापति के नाम के दिए जलाना व्यर्थ है  मुझे मैथिली से ही अपना नाम मिला मेरी भी कुछ गृहस्थियां हैं  मगर घर की खोज जारी है पति है एक तरफ, परिवार है, और तीसरी ओर स्वतंत्रता  इस तिहारे के बीच खड़ी नारी है तुम्ही बतादो धरती अब फिर कोनसे घर जाऊं  तुम्ही बतादो इस बार दिवाली कहाँ मनाऊं  -मैथिली